Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 81, Verse 94
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 81, verse 94 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 81 · श्लोक 94
संस्कृत श्लोक
कालत्रयस्थितजगत्त्रितयान्तरी हि चित्सा तथा कचति तेन यथास्थितेन ।
रूपेण चित्रकृदुदारमनःस्थचित्रसंसारजालसदृशेन कचज्जवेन ॥ ९४ ॥
हिन्दी अर्थ
वह देवी कालरात्रि तीनों काल में स्थित तत्-तत् विचित्र परिणामधारी समस्त त्रिजगत् की भीतरी
चित्-शक्ति है, इस कारण से वह चितेरे के उदार मन में स्थित चित्रसंसार समूह के सदृश
यथास्थित उस विचित्ररूपसे वैसी प्रकाशित होती है । इस प्रकार के प्रकाशन में उस चिति-शक्ति
का परिवर्तनशील तत्-तत् काम-कर्मवासना के परिपाक के अनुसार वेग भी रहता है