Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 82, Verse 10
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 82, verse 10 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 82 · श्लोक 10
संस्कृत श्लोक
अचेतनं यच्चिन्मात्रं न तच्चिन्मात्रमुच्यते ।
न च चिन्मात्रनभसो नष्टं क्वचन युज्यते ॥ १० ॥
हिन्दी अर्थ
नष्ट हुए पदार्थों का भी स्मृति में भान होता है, इसलिए वितिद्रष्टि से किकी भी पदार्थ का
निरन्वयनाथ कहीं प्रसिद्ध नहीं है, यह कहते हैं /
चेतनशून्य जो चिन्मात्र है, वस्तुतः उसे चिन्मात्र नहीं कहते और यह भी युक्त नहीं है कि
चिन्मात्र आकाश का कहीं कुछ नष्ट हो जाय