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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 82, Verses 12–13

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 82, verses 12–13 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 82 · श्लोक 12,13

संस्कृत श्लोक

तस्मात्तस्य यदक्षुब्धं सत्तामात्रं स्वभासनम् । अनादिमध्यपर्यन्तं सर्वशक्तिमयात्मकम् ॥ १२ ॥ तदेतत्त्रिजगत्सर्गकल्पान्तौ व्योम भूर्दिशः । नाश उत्पादनं नाम विनानाभासनं नभः ॥ १३ ॥

हिन्दी अर्थ

(तव किये, जगत्‌ का स्वरूप क्या हैं 2 यदि यह कोई प्रश्न करे, तो उसके इस प्रश्न का उत्तर यह है कि व्रह्मसत्ता ही जगद्‌ का रुप हैं / वह व्रह्मसत्ता तत्व के अक्वोधक प्रमाण के बिना लोकिकद्रष्टि से जगत्प्रलय आदि के आकार से ऐसे भासती है. जैसे स्रपाकार से रज्जु भासती है / परन्तु तत्वाववोधक प्रमाण के द्वारा तो वह यथार्थ से भासती है यह निष्कर्ष है, यों उयसहार करते हैं । इसलिए आदि, मध्य और अन्तशून्य, अक्षुब्ध, सर्वशक्तिमयात्मक ब्रह्म की स्वसत्तामात्र जो अपनी स्थिति है वही इस जगत्‌-त्रयका सर्ग और प्रलय है । वही आकाश है, वही पृथिवी है और वही सब दिशाओं के रूप में सर्ग और प्रलय है । तत्त्वावेदक प्रमाण के बिना ही नाश और उत्पत्ति- ये दोनों अविद्यादूषित दृष्टि से भासते हैं। यह भाव है कि तिमरिरोगयुक्त दृष्टि से चन्द्र की व्योमादिरूपता के भासने के समान ही वस्तुतः ये दोनों शुद्ध सत्तातिरिक्त अर्थशून्य ही हैं