Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 83, Verse 12
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 83, verse 12 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 83 · श्लोक 12
संस्कृत श्लोक
यथा चिद्व्योम्नि कचति स्व एवात्मा तथा पटे ।
तथा कचति तत्तत्र कल्पान्तानलनर्तने ॥ १२ ॥
हिन्दी अर्थ
जैसे चिदाकाश
में स्वयं ही आत्मा स्फुरित होता है वैसे ही पट में स्फुरित होता है ओर उस कल्पान्त की अग्नि तथा
नृत्य में भी वह उस रूप से स्फुरित होता है