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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 83, Verse 24

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 83, verse 24 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 83 · श्लोक 24

संस्कृत श्लोक

यथा स्वप्ने चिदेवान्तः पुरपत्तनवद्भवेत् । पुरादि न तु तत्किंचिद्विज्ञानाकाशमेव तत् ॥ २४ ॥

हिन्दी अर्थ

श्रान्ति के कारण अन्यथात्व का प्रतिभासत होनेपर भी वास्तविक स्वभाव की अग्रच्चुति में दष्टान्त कहते हैं / जैसे कि स्वप्न में एकमात्र चिति ही अन्तःकरण में ग्राम ओर नगर-सी होती है-नगर आदि का स्वरूप धारण करती है, परन्तु यथार्थ मे वहाँ पुर आदि कुछ नहीं रहते। जो कुछ वहाँ रहता है, वह सब विज्ञानाकाश ही है, उससे अतिरिक्त कुछ नहीं