Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 83, Verse 25
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 83, verse 25 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 83 · श्लोक 25
संस्कृत श्लोक
आत्मनात्मनि चिच्छून्यं ज्ञात्वा च ज्ञेयमप्यलम् ।
तथा च सर्गादारभ्य वेत्ति स्वं कचनं च तत् ॥ २५ ॥
हिन्दी अर्थ
इसलिए समस्त ज्ञेय को भली भाँति
जानकर भी चिति अपने से अपने में सर्वदा ही ज्ञेय को शून्य जानती है । तथा प्रलयकालमें भी
सृष्टि के प्रारम्भ क्षणसे लेकर प्रलय क्षण तक जो जैसे सम्पन्न होता है सबको अपना स्फुरण
समझती है । भाव यह कि वह ब्रह्मचिति सदा सर्वज्ञ प्रसिद्ध है