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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 83, Verse 26

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 83, verse 26 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 83 · श्लोक 26

संस्कृत श्लोक

स्वयमन्तः कचन्ती चित्स्वभावाकाशकोटरे । क्षणकल्पजगद्भ्रान्तिं धत्ते कल्पनया स्वया ॥ २६ ॥

हिन्दी अर्थ

एकमात्र यही कारण है कि उस छरष्टिकाल में भी प्रलय को अतीत एवं अनागत सभी तरह के हजारों प्रलयो के साथ कह अवश्य देखती रहती है, इसकी भी संभावना करनी चाहिये, इस आशय से कहते हैं / हे श्रीरामचन्द्रजी, यह चिति स्वभावरूप कोटर में भीतर स्फुरित होती हुई अपनी ही कल्पना से क्षण, कल्प तथा जगत्‌ की भ्रान्ति को धारण करती है