Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 84, Verses 13–14
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 84, verses 13–14 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 84 · श्लोक 13,14
संस्कृत श्लोक
गौरी गौराङ्गदेहत्वाद्भवदेहानुषङ्गिणी ।
सुप्तानामथ बुद्धानाममात्रोच्चारणाद्धृदि ॥ १३ ॥
नित्यं त्रैलोक्यभूतानामुमेतीन्दुकलोच्यते ।
शिवयोर्व्योमरूपत्वादसितं लक्ष्यते वपुः ॥ १४ ॥
हिन्दी अर्थ
चूँकि माया का स्वरूप अति गौर है, अतः वही गौरी है, वही
शिवजी के शरीर की चिरसंगिनी है । सुप्त ओर जाग्रत जितने प्राणी त्रैलोक्य में स्थित हैं, उनके
हृदय में अकारादि मात्राओं से रहित शब्दब्रह्मरूप प्रणव के नाद का उच्चारण सदा होता रहता
है, इससे जो अंगुष्ठपरिमित हृदयकमल के छिद्र मेँ लिंगाकार से स्थित शिवजी हैं, उनके मस्तक
में भूषणभूत विन्दुरूपा जो उमारूपा इन्दुकला है, वह भी वही कही जाती है, शिव और शिवा
दोनों आकाशरूप हँ, अतः उनका शरीर असित यानी नील प्रतीत होता है