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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 84, Verse 2

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 84, verse 2 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 84 · श्लोक 2

संस्कृत श्लोक

श्रीवसिष्ठ उवाच । स भैरवश्चिदाकाशः शिव इत्यभिधीयते । अनन्यां तस्य तां विद्धि स्पन्दशक्तिं मनोमयीम् ॥ २ ॥

हिन्दी अर्थ

शिवजी के स्वरूप निरूपण किये बिना शक्ति के स्वरूपका निरूपण नहीं हो सकता, उसनलिष्र दोनों का साथ-साथ स्वरूप बतलाने का उपक्रम करते हैं / श्रीवसिष्ठजी ने कहा : भद्र, जो वह भैरव हैं, वह तो चिदाकाशस्वरूप शिवजी ही कहे जाते हैं, उन शिवजी की वह मनोमयी स्पन्दशक्तिरूपा काली अनन्य ही है, यह आप जानिये । यही माया है, यही शिवजी में एकरूप से अध्यस्त होकर उन्हीं की सत्ता ओर स्फूर्तिं से स्वयं सत्ता एवं स्फूर्ति से युक्त बनती हैं, इसलिए शिवजी से अनन्य है, चलनस्वभाव जो रजोगुण है, इसकी प्रधानता आनेपर स्पन्दनशक्ति कहलाती है ओर सत्त्वगुण की प्रधानता से अपने में चारों ओर इसी कारण से सृष्टि आदि का संकल्प विकल्प करने के कारण मनकी समता ग्रहण करती हुई मनोमयी कही जाती है