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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 84, Verse 3

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 84, verse 3 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 84 · श्लोक 3

संस्कृत श्लोक

यथैकं पवनस्पन्दमेकमौष्ण्यानलौ यथा । चिन्मात्रं स्पन्दशक्तिश्च तथैवैकात्म सर्वदा ॥ ३ ॥

हिन्दी अर्थ

दो द्ष्टान्तोः से माया में अनन्यत्वका समर्थन करते हैं / भद्र, जैसे पवन और स्पन्दन दोनों एक ही वस्तु हैं अथवा जैसे उष्णता एवं अग्नि दोनों एक ही है, वैसे चिन्मात्र शिव एवं स्पन्दनशक्तिरूप माया दोनों सदा ही एकस्वरूप हैं, भिन्नस्वरूप नहीं