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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 84, Verse 20

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 84, verse 20 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 84 · श्लोक 20

संस्कृत श्लोक

ता इमा ब्रह्मणः सर्गजरामरणरीतयः । क्रियासौ ग्रामनगरद्वीपमण्डलमालिकाः ॥ २० ॥

हिन्दी अर्थ

अतः यह देवी क्रियारूपा है, इसलिए उसका अवयव मानना चाहिए, क्योकि निरवयव वस्तु से कोई क्रिया हो नहीं सकती । इस परिस्थिति में अपना ठीक स्वरूप निबाहने के लिए ही कल्पित हाथ, पैर आदि अवयवरूपा होकर अपने भीतर ग्राम, नगर, द्वीप, मण्डल आदि की मालाएँ धारण करती है ओर उनसे स्पन्दन करती है यानी अपनी क्रियारूपता प्रदर्शित करती है