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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 84, Verse 21

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 84, verse 21 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 84 · श्लोक 21

संस्कृत श्लोक

स्पन्दान्करोति धत्तेऽन्तः कल्पितावयवात्मिका । काली कमलिनी काली क्रिया ब्रह्माण्डकालिका ॥ २१ ॥

हिन्दी अर्थ

काली शब्द की व्याख्या में भी उसकी एकमात्र क्रियास्वभावता तथा ब्रह्माण्ड शरीर होने से समस्त लोकादि अवयवधारिणी होना भी चिद्ध हो जाता है, इस आशय से कहते हैं / भद्र, यह काली है । तात्पर्य यह है -“कल गतौ संख्याने च" इस धातु से काल और काली दोनों शब्दों का निर्माण हुआ है । वैयाकरण लोगों का कहना है कि “कल” धातु तो एक कामधेनु है यानी कामधेनु से जो चाहें दुहा जा सकता है, वैसे ही कलधातु से जो भी अर्थ निकालना हो, निकाला जा सकता है । इसलिए यह लाखों ब्रह्माण्डरूप बीज कोशों की निर्माणकर्त्री हे, धारणकर्त्री है और परिणाम आदि विकारों को प्राप्त भी कराती है-यों स्वयं क्रियारूप होती हुई कमललता के सदृश श्यामला भी बन गई है । इसीलिए अपने फूल आदि अवयवरूप इन पृथिवी आदि दृश्य लक्ष्मी को हृदय में धारण करती है