Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 84, Verse 22
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 84, verse 22 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 84 · श्लोक 22
संस्कृत श्लोक
धत्ते स्वावयवीभूतां दृश्यलक्ष्मीमिमां हृदि ।
न कदाचन चिद्देवी निर्देश्यावयवा क्वचित् ॥ २२ ॥
हिन्दी अर्थ
यों जयत्-रूप अगो को धारण करने पर भी उसकी अगठदासीन चिद्रप शिवकस्वभावता होने
के कारण वास्तव में निरवयवता ही है, यह कहते हैं /
वास्तव में चितिरूपा वह देवी न तो कभी शब्दों से वर्णित हो सकती है और न उसके कोई
अवयव ही हैं । भद्र, केवल यही आप जानिये कि वह शिवस्वरूपसे अभिन्न होने के कारण विशुद्ध
शिवात्मक ही है