Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 84, Verse 27
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 84, verse 27 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 84 · श्लोक 27
संस्कृत श्लोक
यथाभूतस्थितेरेव तदेव शिव उच्यते ।
देव्याः क्रियायाश्चिच्छक्तेः स्वरूपिण्या महाकृतेः ॥ २७ ॥
हिन्दी अर्थ
भद्र, चितिशक्ति की स्वरूपभूत, विशाल आकृतिवाली इस क्रियारूपा देवी के,
जिसने कि कल्पितस्वरूप धारण कर लिया है, ये कहे जानेवाले सारे पदार्थ अभिन्न अवयव
ही हैँ । जिसने कल्पित जगत्रूप देह धारण किया है, उस काली के नृत्य में कल्पित गीतों
के सदृश कल्पित सूर्य आदि की माला का धारण करना भी उचित ही है