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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 84, Verses 28–32

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 84, verses 28–32 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 84 · श्लोक 28-32

संस्कृत श्लोक

कल्पिताकारधारिण्या अनन्यावयवा इमे । सर्गाः सज्जनतावर्गा लोका आलोकभास्वराः ॥ २८ ॥ सद्वीपसागराः पृथ्व्यः सवनावनयोऽद्रयः । साङ्गोपाङ्गास्त्रयो वेदाः सविद्यास्थानगीतयः ॥ २९ ॥ सविधिप्रतिषेधार्थाः सशुभाशुभकल्पनाः । सदक्षिणाग्नयो यज्ञाः पुरोडाशाद्यशंसिनः ॥ ३० ॥ भूपालोलूखलवृसीशूर्पयूपादिसयुताः । संग्रामाः सायुधग्रामाः सशूलशरशक्तयः ॥ ३१ ॥ सभुशुण्डीगदाप्रासहयेभभटभासुराः । ज्ञातयो भूतसंघानां चतुर्दश सुरादिकाः । चतुर्दशाब्धिद्वीपोर्व्यस्तथा लोकाश्चतुर्दश ॥ ३२ ॥

हिन्दी अर्थ

ये सब उसके अनन्य अवयव हैं-विद्यमान जनतावर्ग से युक्त सृष्टियाँ आलोक से भास्वर लोक, द्वीप एवं सागरो से पूर्ण पृथ्वी, वन और भूमि से युक्त पर्वत, अंग-उपांगों से, विद्यास्थान तथा गीतियों से, विधि-निषेध रूप अर्थो से एवं शुभाशुभ कल्पनाओं से युक्त वेद, पुरोडाशरूप द्रव्य से वर्णित होने वाले, राजे, ओखली, आसन, सूप, स्तम्भों से युक्त दक्षिणाग्निवाले यक्ष, त्रिशूल, बाण एवं शक्ति आदि अनेकविध आयुधो से एवं बन्दूक, गदा, प्रास, घोडे, हाथी, योधा आदि से युक्त संग्राम एवं पृथ्वी तथा चौदह लोक ये सभी उस महादेवी के अंग हैँ