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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 84, Verse 33

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 84, verse 33 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 84 · श्लोक 33

संस्कृत श्लोक

श्रीराम उवाच । चितेः कल्पाः शरीरिण्याः सर्गा येऽङ्गे स्थितास्तथा । ते किमात्मनि तिष्ठन्ति उतासत्या वदेति भो ॥ ३३ ॥

हिन्दी अर्थ

ङस प्रकार आपने दो प्रश्नो का यद्यापि समाधान तो किया, तथापि पूर्व सर्ग में उक्त इस शक्रा का समाधान नहीं हुआ कि कैसे द्वैत और ऐक्य एक काल में रह सकते हैं| क्योंकि विनष्ट असत्‌ पदार्थ किसी अर्थ-क्रिया का सम्पादन नहीं कर सकते / अपने अस्तित्व के प्रभाव से कार्य का अस्तित्व पैदा करना ही कारणों की कार्यार्थकिया हे ओर उपादान के साथ कार्यो की अर्थ-क्रियाकारिता या सत्ता का अपहरण नाश है / एक समय में कार्यों में सत्ता या सत्ता का अपहरण उनका कारण कर नहीं सकता / ऐसे पदार्थ जो कि अपने कारणों की सत्ता के साथ अपनी भी सत्ता खो बेठे हैं; प्रलय में अपनी-अपनी अर्थक्रिया का निर्वाह कभी नहीं कर सकते, इस आशय को लेकर श्रीरामभद्र प्रश्न करते हैं / श्रीरामभद्र ने कहा : भगवन्‌, रुद्र और काली के शरीर को धारण की हुई चिति के अंग में प्रलयकाल में भी अतीत अनागत आदि समस्त सर्ग, कल्प ओर प्रलय स्थित हैं, यह जो आपने वर्णन किया है, उसमें मैं आपसे एक प्रश्न करता हूँ। वह यह कि जो सृष्टि आदि स्थित हैं, वे क्या सत्स्वभाव अर्थक्रिया समर्थ आत्मा में स्थित हैं यानी सत्‌ हैं या मृगतृष्णाजल के सदृश असत्य, सत्स्वभाव से रहित हैं ? यह कहिये