Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 84, Verse 43
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 84, verse 43 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 84 · श्लोक 43
संस्कृत श्लोक
प्राप्यन्ते योगसिद्धेन तद्भावं तु गतेन ते ।
अन्येन पर्वता ग्रामा गत्या देशान्तरे यथा ॥ ४३ ॥
हिन्दी अर्थ
इस्रीलिए दूसरे के स्वप्नो में अनुभूत होनेवाले पदार्थों का योगी लाभ करते हैं ओर भोग भी
करते हैं; यह कहते हैं /
जैसे अन्य स्थान में विद्यमान पर्वत, गाँव आदि पदार्थ वहाँ गमन करने से प्राप्त हो जाते हैं,
वैसे ही स्वप्नद्रष्टा पुरुष से भिन्न दूसरा योगसिद्ध पुरुष भी परकाय-प्रवेशसिद्धि द्वारा उसके हृदय
में जाकर उसका मनरूप होकर उसके स्वाप्न पदार्थों को प्राप्त हो जाता है