Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 85, Verse 18
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 85, verse 18 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 85 · श्लोक 18
संस्कृत श्लोक
संविन्मात्रैकधर्मित्वात्काकतालीययोगतः ।
संविद्देवी शिवं स्पृष्ट्वा तन्मयीव भवत्यलम् ॥ १८ ॥
हिन्दी अर्थ
यह प्रकृति एकमात्र चितिशक्ति की आधारभूत
है, इसलिए चितिशक्ति ही समझनी चाहिए। काकतालीय योग से यह चितिदेवी जब शिवजी का स्पर्शं
कर लेती है, तब शिवरूप ही हो जाती है