Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 85, Verse 19
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 85, verse 19 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 85 · श्लोक 19
संस्कृत श्लोक
प्रकृतिः पुरुषं स्पृष्ट्वा प्रकृतित्वं समुज्झति ।
तदन्तरेकतां गत्वा नदीरूपमिवार्णवे ॥ १९ ॥
हिन्दी अर्थ
पुरुष को छूकर समुद्र मे नदी के सदृश उसके अन्दर
एकरूप बनकर प्रकृति अपना कार्यरूप परिणाम छोड़ देती है