Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 85, Verse 20
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 85, verse 20 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 85 · श्लोक 20
संस्कृत श्लोक
आपगा हि पयोमात्रं सङ्गे अर्णव एव सा ।
यदा तदा तमेवाशु प्राप्य तत्रैव लीयते ॥ २० ॥
हिन्दी अर्थ
इसमें युक्ति बतलाते है/
नदियों का स्वरूप तो केवल जलमात्र ही है, समुद्र का संग होनेपर भी उसका वही रूप
रहता है । जब यही असली स्थिति है, तब वह उसको (समुद्र को) प्राप्त कर तत्काल ही उसी
में एकरूप से लीन हो जाती है