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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 85, Verse 21

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 85, verse 21 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 85 · श्लोक 21

संस्कृत श्लोक

चितिः शिवेच्छा सा देवं तमेवासाद्य शाम्यति । जन्मस्थानशिलां प्राप्य तीक्ष्णधारा यथायसी ॥ २१ ॥

हिन्दी अर्थ

राघव, लोहनिर्मित छुरी आदि की धारा उत्पत्तिकारण लोहशिला को प्राप्त कर उसीमें जैसे शान्त हो जाती है यानी लोहे मेँ मिल जाने पर धार कुछ काम नहीं कर पाती, ठीक वैसे ही वह शिवेच्छारूप चितिशक्ति उस शिव देवको ही पाकर उसमें शान्त हो जाती है । फिर संसार में कुछ काम कर नहीं पाती