Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 85, Verse 22
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 85, verse 22 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 85 · श्लोक 22
संस्कृत श्लोक
पुंसश्छायां निजच्छाया प्रविष्टस्य शरीरकम् ।
यथाशु प्रविशत्येव प्रकृतिः पुरुषं तथा ॥ २२ ॥
हिन्दी अर्थ
वन आदि की छाया
में प्रवेश किये हुए पुरुष की निजी छाया, जैसे उसीके रूपकी हो जाती है, वैसे ही पुरुष में
प्रविष्ट हुई प्रकृति पुरुषरूप ही हो जाती है