Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 85, Verses 26–27
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 85, verses 26–27 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 85 · श्लोक 26
संस्कृत श्लोक
चितिनिर्वाणरूपं यत्प्रकृतिः परमं पदम् ।
प्राप्य तत्तामवाप्नोति सरिदब्धाविवाब्धिताम् ॥ २६ ॥
तावद्विमोहवशतश्चितिराकुलेषु सर्गेषु संसरति जन्मदशासु तासु ।
यावन्न पश्यति परं तमथाशु दृष्ट्वा तत्रैव मज्जति घनं मधुनीव भृङ्गी ॥ २७ ॥
हिन्दी अर्थ
चूँकि चिति में निर्वाणात्मक
प्रशान्त स्वरूप ही परमपद है, इसलिए प्रकृति (अज्ञानयुक्त चिति) उसे प्राप्त कर जिस प्रकार समुद्र
में नदी समुद्ररूपता प्राप्त करती है उसी प्रकार तद्रूप बन जाती है