Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 85, Verse 28
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 85, verse 28 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 85 · श्लोक 28
संस्कृत श्लोक
संप्राप्य कस्त्यजति नाम तदात्मतत्त्वं प्राप्यानुभूय च जहाति रसायनं कः ।
शाम्यन्ति येन सकलानि निरन्तराणि दुःखानि जन्ममृतिमोहमयानि राम ॥ २८ ॥
हिन्दी अर्थ
यहाँ तक जितनी बातें कही यह. उन सबका संग्रहकर उपहार करते हैं /
हे रामभद्र, जब तक उस परब्रह्म परमात्मा को चिति साक्षात् नहीं देखती, तब तक विशाल
मोह के प्रभाव से आक्रान्त होकर प्रतिकूल इन सर्गो मे ओर उन जन्म आदि दशाओं में भ्रमण करती
है और जब उसे देख लेती है, तब तो उसमें तन्मय बनकर ऐसे डूब जाती है, जैसे कि मधु में भ्रमरी
डूबती है।।२७॥ हे रामभद्र, लगातार आनेवाले जन्म, मरण एवं मोहमय सकल दुःख जिससे शान्त
हो जाते हैं, उस आत्मा को प्राप्त कर कौन पुरुष ऐसा है जो छोड़ दे ? क्या कोई रसायनों को
(अमृत को) प्राप्त और अनुभव कर कहीं छोड़ सकता है ?