Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 86, Verse 1
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 86, verse 1 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 86 · श्लोक 1
संस्कृत श्लोक
श्रीवसिष्ठ उवाच ।
श्रृणु राम कथं तत्र महाकाशे तथा स्थितः ।
देहे भ्रान्तिं तु तां त्यक्त्वा स रुद्रोऽप्युपशाम्यति ॥ १ ॥
हिन्दी अर्थ
सबसे पहले रुद्रदेह के उयसहार क्रम को छुनाते हैं /
श्रीवसिष्ठजी ने कहा : श्रीरामजी, उस महाकाश में उस प्रकार से अवस्थित ये महारुद्र जिस
रीति से अपनी देहगत उक्त भ्रान्तिका त्यागकर शान्त हो जाते हैं, उस रीति का श्रवण कीजिये
सर्ग सन्दर्भ
पचासीवाँ सर्ग समाप्त छियासीवोाँ सर्ग ब्रह्माण्डरूपी खोपड़ी को ग्रस लेनेवाले रुद्रशरीर का सूक्ष्मभाव से शिलारूप चिदाकाश में तिरोभाव तथा उस प्रदेश से भिन्न अन्य प्रदेशों के अन्य शिला, वृक्ष आदि सकलरूप ब्रह्म में सृष्टि की विचित्रता का दर्शन।