Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 85, Verses 7–8
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 85, verses 7–8 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 85 · श्लोक 7,8
संस्कृत श्लोक
नृत्यन्त्याथ यदा तत्र तथा तस्मिन्पराम्बरे ।
काकतालीययोगेन संरम्भवशतः स्वयम् ॥ ७ ॥
निकटस्थः शिवः स्पृष्टः स मनागभ्रमन्तिकम् ।
वाडवोऽग्निः स्वनाशाय वहन्त्येवाम्बुलेखया ॥ ८ ॥
हिन्दी अर्थ
भद्र, तदनन्तर जैसे बह रही समुद्रजल की रेखा अपने विनाश के लिए बड़वाग्निका स्पर्श
करती है, ठीक वैसे ही उस चिदाकाश में नृत्य कर रही उस कालरात्रि ने काकतालीय योग
से अत्यन्त प्रेम से निकटवर्ती शिवजी का स्पर्श कर लिया । ज्यों ही उसने स्पर्श किया त्यों
ही उसका आवरण करनेवाला शक्तिरूप अंश थोड़ा-सा हट गया