Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 86, Verse 20
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 86, verse 20 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 86 · श्लोक 20
संस्कृत श्लोक
सर्गसंरम्भवलितं यावत्तमपि तादृशम् ।
यं यं प्रदेशं पश्यामि शिलायास्तत्र तत्र वै ॥ २० ॥
हिन्दी अर्थ
भद्र, उस शिला के जिस-जिस
प्रदेश को मैं देखता, उस-उस प्रदेश में निर्मल दर्पण में प्रतिबिम्ब के सदुश, जगत् दिखाई देता
था