Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 86, Verse 27
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 86, verse 27 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 86 · श्लोक 27
संस्कृत श्लोक
क्वचित्किंचित्पुरव्यूहदैत्यसंगरदुस्तरम् ॥ २७ ॥
हिन्दी अर्थ
कहीं पर जगत् बड़े-बड़े पर्वतों के समूहों से इतना व्याप्त था कि उसमें तनिक भी अवकाश नहीं
रह गया था और कहीं पर दूसरी कोई सृष्टि ही उत्पन्न नहीं हुई थी, केवल ब्रह्माजी ही उत्पन्न हुए
थे