Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 86, Verse 52
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 86, verse 52 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 86 · श्लोक 52
संस्कृत श्लोक
स्फुरन्त्यर्थसमा भावाः केचिदब्धितरङ्गवत् ।
पुनस्त्वं पुनरेवाहं पुनः पुनरिमे जनाः ॥ ५२ ॥
हिन्दी अर्थ
राघव, फिर-फिर
तुम, फिर-फिर हम और ये मनुष्य भी फिर-फिर उत्पन्न होते ही रहते हैं । वास्तव में तत्त्वदृष्टि से
चेतनात्मा में कभी ये या दूसरे या यह सारा जगत् न उत्पन्न होता है या न स्फुरित ही होता है