Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 86, Verse 53
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 86, verse 53 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 86 · श्लोक 53
संस्कृत श्लोक
न कदाचन नैवान्ये संभवन्त्यखिलं परे ।
त एवान्येऽथवाम्भोधौ तरङ्गा इव निर्णयः ॥ ५३ ॥
हिन्दी अर्थ
मायादृष्टि से ही वे उत्पन्न होते हैं या अन्य उत्पन्न होते हैं; इस विषय का तो निर्णय है ही
नहीं; यह कहते हैं /
समुद्र में वे ही तरंगें दूसरी बार आई या दूसरी तरंगें आई, यह जैसे अभी तक निर्णय नहीं हो
पाया है, वैसे ही भ्रमण कर रहे प्राणी वे ही आये या दूसरे आये इसका भी अभी तक निर्णय नहीं हो
पाया है