Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 86, Verse 54
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 86, verse 54 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 86 · श्लोक 54
संस्कृत श्लोक
यद्वन्न जायते तद्वद्भूतानां भ्रमतां भवेत् ।
आयान्ति यान्त्यनन्तानि भूतानीह भवद्भ्रमैः ॥ ५४ ॥
हिन्दी अर्थ
भद्र, इस संसार में उत्पन्न हो रहे अनेकविध भ्रमों के कारण भूतसमुदाय आते और
जाते रहते हैं । कोई तो उसी रूप से आते हैं, कोई अन्य रूप से आते हैं, कोई समान रूप से आते
हैं और कोई विषम रूप से आते हैं