Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 86, Verse 9
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 86, verse 9 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 86 · श्लोक 9
संस्कृत श्लोक
तादृशोऽपि महारम्भः पुरः पश्यत एव मे ।
इति सावरणे तेन ते ब्रह्माण्डकवाटके ॥ ९ ॥
हिन्दी अर्थ
भद्र, भगवान् शंकरजी ने
आवरणयुक्त ब्रह्माण्ड रूपी कपाट उस प्रकार निगल लिया, जिस प्रकार कि क्षुधार्त हरिण क्षुद्र पत्ते
को निगल जाता है