Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 86, Verse 10
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 86, verse 10 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 86 · श्लोक 10
संस्कृत श्लोक
विनिगीर्णे क्षुधार्तेन हरिणेनेव पर्णके ।
अथाभून्निर्मलं व्योम शान्तं ब्रह्मैव केवलम् ॥ १० ॥
हिन्दी अर्थ
तदनन्तर वह दृश्यरूप कालिमा से रहित चिदाकाशरूप शान्त केवल
ब्रह्मरूप ही रह गया । वह आदि, मध्य ओर सीमा से शून्य केवल ज्ञानस्वरूप ही रहा