Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 87, Verse 10
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 87, verse 10 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 87 · श्लोक 10
संस्कृत श्लोक
गतं स्वभावं चिद्व्योम यथा त्वं राम निद्रया ।
जाग्रद्वा स्वप्नलोकं वा विशन्वेत्सि ससं घनम् ॥ १० ॥
हिन्दी अर्थ
यह आकाशतः विद्घन के भीतरी शून्यश्रावग्राप्तिरूय सृक्ष्मता आधिक्य न था, किन्तु वित्
की चक्ष्मता की अपेक्षा जाज्य अधिक होने से स्थूलता ही थी, इस आशय से दृष्टान्त द्वारा
सम्भावना करते हैं
हे श्रीरामचन्द्रजी, जैसे नींद आ जाने से उसके द्वारा स्वप्न के जाग्रत लोक या स्वप्न के स्वप्नलोक
में प्रविष्ट होते हुए आप अपनी आत्मा के ही समान घन उसके आधार स्वभाव को समञ्जते हैँ वैसे
ही स्वभाव को प्राप्त चिदाकाश का मैंने अनुभव किया, यह आप सम्भावना कर लीजिये