Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 87, Verse 11
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 87, verse 11 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 87 · श्लोक 11
संस्कृत श्लोक
दिङ्मात्राकाशमेवादौ ततोऽस्मीत्येव वेदनम् ।
तद्घनं कथ्यते बुद्धिः सा घना मन उच्यते ॥ ११ ॥
हिन्दी अर्थ
दिङ्मात्र (७) आकाश ही सर्वप्रथम चिन्तन करने से चित्त होता है । तदनन्तर “मैं आकाश हूँ” ऐसा
जो वेदन है वह अहंकार कहलाता है । उसके बाद “आकाशमेव' ऐसे निश्चय से और पूर्वभाव के विस्मरण
से वह बुद्धि कहलाता है और वही (बुद्धि ही) जब संकल्प, विकल्प, काम तथा विचिकित्सा आदि
की नानाविध कल्पनाओंवाली बन जाती है तब “मन” इस नाम से कही जाने लगती है