Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 87, Verse 12
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 87, verse 12 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 87 · श्लोक 12
संस्कृत श्लोक
तद्वेत्ति शब्दतन्मात्रं तन्मात्राणीतराण्यथ ।
पञ्चेन्द्रियाणि तत्स्थौल्यादितीन्द्रियगणोदयः ॥ १२ ॥
हिन्दी अर्थ
वही इस तरह विषयों की कल्पना करने के अनन्तर उनकी ग्राहक इन्द्रियों की भी कल्पना
करते है यह कहते हैं ।
इस तरह वह पहले शब्द-तन्मात्रा की कल्पनी करता है । उसके अनन्तर अन्य तन्मात्राओं की
कल्पना करता है । तदनन्तर उनकी स्थूलता से पाँच इन्द्रियो की कल्पना करता है । इस प्रकार
इन्द्रियों के समुदाय का उदय होता है