Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 87, Verse 20
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 87, verse 20 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 87 · श्लोक 20
संस्कृत श्लोक
प्रेक्षे तावदहं किंचिदिति बोधाल्लघोस्ततः ।
मनागालोकनायैव संप्रवृत्तोऽनुभूतवान् ॥ २० ॥
हिन्दी अर्थ
उसके पश्चात् 'मैं कुछ देखू" इस साधारण बोधसे जब कुछ देखने के लिए
प्रवृत्त हुआ, तो मुझे अनुभव हुआ कि मैं उस स्थूल शरीर में चक्षु आदि इन्द्रियों की कल्पना द्वारा
रूप आदि का अवलोकन करनेवाला बन गया हूँ