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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 87, Verse 25

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 87, verse 25 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 87 · श्लोक 25

संस्कृत श्लोक

पश्यामीति ततस्तत्र मनाग्वोधो ममोदभूत् । ततो रन्ध्रद्वयेनाहमपश्यं यत्तदप्यखम् ॥ २५ ॥

हिन्दी अर्थ

देह में चक्षु आदि छिद्रों की कल्पना आदि के दर्शन आदि जनित कौतुक के वाद वहाँ पर भे देख, ऐसा तनिक बोध मुझमें उदित हुआ । तदन्तर जब मैं नेत्ररूप दोनों छिद्रो से देखने लगा, तो मुझे कुछ ऐसा लगा कि जो कुछ मैं देख रहा हूँ, वह भी आकाश से भिन्न ही है