Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 87, Verse 3
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 87, verse 3 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 87 · श्लोक 3
संस्कृत श्लोक
ऊर्ध्वमुच्छून एवान्तःसेकाद्बीजे यथाङ्कुरः ।
आकारवत्यनाकारे चित्त्वाचित्त्वे तथा जगत् ॥ ३ ॥
हिन्दी अर्थ
जैसे बीज में भीतर विद्यमान अंकुर सींचने से विकसित होकर ऊपर की ओर निकल आता है वैसे
ही मूर्त-अमूर्त, चेतन ओर अचेतन सभी वस्तुओं मे यह जगत् है