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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 87, Verses 1–2

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 87, verses 1–2 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 87 · श्लोक 1,2

संस्कृत श्लोक

श्रीवसिष्ठ उवाच । ततश्चिदाकाशवपुर्व्याप्यनन्तो निरामयः । दत्तावधानो वपुषि तदा पश्याम्यहं क्वचित् ॥ १ ॥ यावदन्तर्गतः सर्गः संस्थितोऽङ्कुरितोपमः । कुसूलस्येव बीजस्य सिक्तस्येवाङ्कुरो हृदि ॥ २ ॥

हिन्दी अर्थ

जै मेने ध्यानपूर्ण द्रष्ट से शिला, वृक्ष, तृण आदि समस्त पदार्थो मे कृष्टयो देखी थी वैते ही अपने शरीर के अवयवो में भी ध्यानपूर्ण द्रष्टि ग्रे अनेक सृष्टियाँ देखी, यह कहते है/ श्रीवसिष्ठजी ने कहा : हे श्रीरामचन्द्रजी, शिला, तृण, गुल्मादि में विचित्र सर्ग देखने के बाद निरामय, सर्वव्यापी, अनन्त, चिदाकाशस्वरूप तथा समाहितचित्त होकर जब मैं देखने लगा, तो में क्या देखता हूँ कि मेरे शरीर के ही भीतर सर्ग स्थित है, जिसकी उपमा अंकुरित बीज से दी जा सकती है । यह सर्ग उहरी के भीतर स्थित वृष्टि से सिक्त हुए बीज के अंकुर के सदृश है

सर्ग सन्दर्भ

छियासीवाँ सर्ग समाप्त सत्तासीवों सर्ग देह, इन्द्रिय आदि की उत्पत्ति के क्रम से अपनी देह में ही विश्व की कल्पना तथा अपनी स्वय॑भूरूपता का श्रीवसिष्ठजी के द्वारा वर्णन।