Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 86, Verse 59
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 86, verse 59 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 86 · श्लोक 59
संस्कृत श्लोक
कालेनाकुलचेष्टयान्य इव ते गच्छन्त्यधोर्ध्वं पुनदेहालेखनखेदितान्यगणितान्यन्यानि चान्यान्यलम् ।
भूताम्बूनि वहन्ति संसृतिमये तान्यम्बुधौ चञ्चले चक्रावृत्तिमयानि संकलयितुं शक्नोति कस्तान्यलम् ॥ ५९ ॥
हिन्दी अर्थ
धर्माधर्म चेष्टा के कारण कालवश विचित्र अनेक देह धारण से दूसरे दूसरे रूपवाले बनकर नीचे एवं
ऊपर के लोकों मेँ बार-बार आते जाते रहते हैं, इसलिए चंचल संसारमय समुद्र में चक्राकार
आवर्तमय जो प्राणीरूप जल बह रहा है, वे सदुश हैं, विसदृश हैं, अथवा वे ही है या अन्य है, इस
विषय का निर्धारण भलीभाँति कौन पुरुष कर सकता है यानी कोई नहीं कर सकता