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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 86, Verse 58

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 86, verse 58 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 86 · श्लोक 58

संस्कृत श्लोक

तज्जीवास्तैर्विसदृशा भवन्त्यन्यशरीरिणः । सर्वैरेभिः समाः केचित्कालेनैव विलक्षणाः । कालेन सदृशाः केचिदनेन च विलक्षणाः ॥ ५८ ॥

हिन्दी अर्थ

ऐसे ही जीवों का भेद होने पर शरीर भिन्न हों; यह भी नियम नहीं है, इस आशय से कहते हैं / किसी समय धन आदि से एकरूप होते हुए भी ये जीव काल के प्रभाव से अन्य समय में ठीक उनसे विपरीत हो जाते हैँ । किसी समय काल के प्रभाव से सदृश होते हैं, तो शरीर के प्रभाव से विसदृश होते हैं