Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 87, Verse 31
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 87, verse 31 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 87 · श्लोक 31
संस्कृत श्लोक
स्पर्शनेन्द्रियतन्मात्रमिति वेदिनि संस्थितम् ।
आस्वादसंविद्याभून्मे तदास्वाद्यरसेन्द्रियम् ॥ ३१ ॥
हिन्दी अर्थ
इस रीति से अनुभव करनेवाले मुझमें स्पर्श -इन्द्रिय तन्मात्रा की सिद्धि हुई | और मुझमें
रसास्वाद लेने की संवित् (इच्छा) प्रादुर्भूत हुई वही आस्वादन करने योग्य रसभेदं से युक्त
रसेन्द्रिय तैयार हो गई