Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 87, Verse 30
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 87, verse 30 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 87 · श्लोक 30
संस्कृत श्लोक
येन स्पृष्टमिवाङ्गं तत्तदाहमनुभूतवान् ।
सत्संवेदनमात्रात्मा सोऽयं वायुरिति स्मृतः ॥ ३० ॥
हिन्दी अर्थ
जिससे छुए
हुए-से तत्-तत् अंगों का मैंने अनुभव किया, वह एकमात्र सत्यसंकल्पस्वरूप पवन कहा गया
है