Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 87, Verse 37
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 87, verse 37 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 87 · श्लोक 37
संस्कृत श्लोक
अन्तःकरणरूपत्वमेवमत्राहमास्थितः ।
आतिवाहिकदेहात्मा चिन्मयव्योमरूपवान् ॥ ३७ ॥
हिन्दी अर्थ
इस तरह वस्तुतः
(0)) श्रोत्रादि का व्यापार भी प्राण के अधीन है, यह दिखलाने के लिए “विचरता मरुता" यह
कहा गया है ।
चिदाकाशरूप सूक्ष्म शरीरधारी मैं ही अन्तःकरणरूपता को प्राप्त होकर स्थित हूँ