Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 87, Verse 38
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 87, verse 38 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 87 · श्लोक 38
संस्कृत श्लोक
पवनाद्यप्यहं शून्यः केवलाकाशमात्रकः ।
सर्वेषामेव भावानां शून्याकृतिररोधकः ॥ ३८ ॥
हिन्दी अर्थ
चूँकि पवन
से भी सूक्ष्म केवल आकाशमात्र शून्य-स्वरूप मैं आकृतिशून्य ही हूँ, इसीलिए सभी कल्पित हो रहे
भाव पदार्थों का मैं न तो निरोधक हूँ ओर न निवारक ही हूँ