Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 87, Verse 40
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 87, verse 40 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 87 · श्लोक 40
संस्कृत श्लोक
तेनाहंप्रत्ययेनाथ शब्दं कर्तुं प्रवृत्तवान् ।
शून्य एव यथा सुप्तः स्वप्नोड्डीननरो रवम् ॥ ४० ॥
हिन्दी अर्थ
वैसी वृत्ति होने से स्वप्न में उड़कर आकाश में संचरण कर रहा सुप्त
मनुष्य जैसे शब्द करता है उसी तरह मैंने भी शब्द करना शुरू किया