Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 87, Verse 45
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 87, verse 45 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 87 · श्लोक 45
संस्कृत श्लोक
एवं जगति संपन्ने ममैतस्मिन्मनोमये ।
न किंचित्तत्र संपन्नं तच्छून्यं व्योम केवलम् ॥ ४५ ॥
हिन्दी अर्थ
इस प्रकार मेरे इस मनोमय जगत् के सम्पन्न हो जाने पर
भी वास्तव में कुछ भी सम्पन्न नहीं हुआ है । वह सब शून्य केवल आकाश ही था