Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 87, Verse 44
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 87, verse 44 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 87 · श्लोक 44
संस्कृत श्लोक
एवमस्मि समुत्पन्नो न तु जातोऽस्मि किंचन ।
दृष्टवानस्मि ब्रह्माण्डं ब्रह्माण्डान्तं न किंचन ॥ ४४ ॥
हिन्दी अर्थ
इस तरह मैं ब्रह्मरूप से समुत्पन्न हूँ, मैंने किसी दूसरी वस्तु के रूप में जन्म नहीं लिया
है । ब्रह्मस्वरूप होकर मैंने अपनी ही स्थूलदेहभूत आवरणयुक्त ब्रह्माण्ड देखा । ब्रह्माण्ड से
बहिर्भूत मैं कुछ नहीं देख सका