Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 87, Verse 43
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 87, verse 43 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 87 · श्लोक 43
संस्कृत श्लोक
ब्रह्मैव सोऽस्मि संपन्नः सृष्टेः कर्ता जगद्गुरुः ।
ततो मनोमयेनैव कल्पिताः सृष्टयो मया ॥ ४३ ॥
हिन्दी अर्थ
इस तरह सृष्टि का कर्ता जगदगुरु मैं ब्रह्मा ही हो गया और इसके
अनन्तर ब्रह्म शरीर को, जो कि मनोमय ही था, धारण करनेवाले मैंने सृष्टियों की कल्पना
की